हमारे पड़ोस में एक मास्टर साहब रहते हैं। मास्टर जी हैं तो उनका रुतबा होना भी स्वभाविक है। जिधर से निकल जाएं सब मास्टर जी कहकर नमस्ते करते हैंं। गांव के नेता टाइप लौंडे भी उनका सम्मान करते हैं। उनके छोटे-मोटे काम बिना किसी परेशानी के हो जाते थे। इन सब का असर यह हुआ कि मास्टर जी को भ्रम हो गया कि वो बहुत ही स्पेशल प्राणी हैं। इसलिए प्रभाव जमाने के लिए अक्सर पड़ोसियों और जान-पहचान वालों से (उनके रुके हुए कामों के संबंध में ) कह देते कि तुम्हारा यह काम हम करा देंगे! इसमें कौन सी बड़ी बात हैं? किसी की शादी न हो रही हो! मास्टर जी कह दें हम करा देंगे! कराएं या न कराएं लेकिन मास्टर जी आश्वासन जरूर दे देते थे। इस तरह सब ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक सबकी परीक्षा लेने वाले मास्टर जी की स्वयं की परीक्षा का दिन आ गया।
एक दिन पड़ोस के इंजीनियर साहब, मास्टर जी का भरा हुआ गैस सिलिंडर मांग कर ले गए। इंजीनियर साहब ने वादा किया था कि चार-पाँच दिनों में ही वो मास्टर जी को दूसरा भरा सिलिंडर दे देंगे। 15 दिन होने को आए किंतु इंजीनियर साहब ने मास्टर जी को गैस सिलिंडर वापस नहीं किया। मास्टरनी ने बार-बार मास्टर जी को याद दिलाया था कि घर में गैस ख़त्म होने वाली है। आखिरकार 16 वें दिन गैस खत्म हो गयी। मास्टर जी जानते थे कि अगर गैस सिलिंडर नहीं मिला तो खाना नहीं मिलेगा! मास्टर जी ने इंजीनियर साहब को फोन लगाया तो उनका फोन स्विच ऑफ मिला। फोन घर पर ही छोड़कर मास्टर जी सीधे उनके घर चले गये। लेकिन इंजीनियर साहब, घर पर ताला लगा पहले ही गायब हो चुके थे। मास्टर जी ने मन ही मन इंजीनियर साहब को जमकर कोसा! मास्टर जी तुरंत समझ आ गया कि इंजीनियर साहब के भरोसे रहे तो भोजन नहीं मिलेगा। इसलिए उन्होंने पड़ोसियों से गैस सिलिडंर माँगने में भलाई समझी। मास्टर जी को पूरा विश्वास था कि एक सिलिंडर तो किसी न किसी से मिल ही जाएगा।
पूरे विश्वास के साथ मास्टर जी एक पड़ोसी के घर सिलिंडर मांगने चले गए। मास्टर जी की इस पड़ोसी से अच्छी बनती थी। हालांकि पड़ोसी ने पूरी बात सुनते ही हाथ खड़े कर दिए और यह कहकर मना कर दिया कि परिस्थितियों को देखते हुए घर में रखा भरा सिलिंडर देने का रिस्क नहीं लिया जा सकता। पड़ोसी ने तो उल्टे मास्टर जी की ही क्लास लगा दी! पड़ोसी ने मास्टर जी को नसीहत देते हुए कहा, 'अरे मास्टर जी, आप को पता है कि इन दिनों गैस के लिए कितनी मारामारी है। आपको उस इंजीनियर को सिलिंडर देना ही नहीं चाहिए था!' पड़ोसी की सलाह मास्टर जी को कतई अच्छी नहीं लगी। उन्हें दूसरों से ज्ञान लेने की आदत ही नहीं थी। उन्होंने तो आज तक दूसरों को ज्ञान दिया था। मास्टर जी वापस तो आ गए लेकिन पहली बार थोड़े से निराश लग रहे थे। वैसे मास्टर जी को अभी भी पूरा भरोसा था कि वो कहीं न कहीं से गैस का जुगाड़ कर ही लेंगे!
एक गैस सिलिंडर का जुगाड़ करने के लिए मास्टर जी अपने प्रयास तेज कर दिए। इस दौरान पड़ोसी वर्मा जी की बातों से उन्हें
उम्मीद की किरण दिखायी देने लगी। वर्मा जी ने मास्टर जी को बताया कि गैस एजेंसी वाले ने उनके कनेक्शन पर किसी और को गैस सिलिंडर डिलीवर कर दिया जबकि स्वयं वर्मा जी ने पिछले महीने से गैस बुक ही नहीं कराई थी! सुझाव यह था कि मास्टर जी , वर्मा जी के साथ गैस एजेंसी चले जहां वे दोनों गैस एजेंसी वालों से बात करेंगे कि भाई जो सिलिंडर वर्मा जी को मिलना चाहिए था वो आप लोगों की कृपा से किसी और को दे दिया गया है। हमारे पास इसके पूरे सबूत हैं कि न तो हमने गैस बुक की थी और न ही कोई सिलिंडर हमारे घर आया है। आपसे प्रार्थना है कि वर्मा जी का सिलिंडर वर्मा जी को दिया जाए वरना हम आपकी शिकायत करेंगे। और अगर सिलिंडर मिल जाता है तो वो मास्टर जी अपने साथ ले जा सकते हैं! योजना के मुताबिक मास्टर साहब और वर्मा जी गैस एजेंसी पर आ धमके।
गैस एजेंसी पर वर्मा जी जैसे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी। सबसे ज्यादा संख्या उन लोगों की थी जिनके हिस्से के गैस सिलिंडर एजेंसी वालों ने दूसरों को ब्लैक में दे दिए थे। लेकिन वहां बैठे कर्मचारियों के तेवर ने मास्टर जी का ब्लड प्रेशर बढ़ा दिया। कर्मचारियों का दावा था कि किसी का भी सिलिंडर ब्लैक में नहीं दिया गया है। आप लोगों ने गैस बुक की होगी और अपने जानने वालों को सिलिंडर की डिलीवरी करा दी होगी।अब आपको अगला गैस सिलिंडर निर्धारित समय पूरा होने पर ही मिलेगा। लोगों ने शोर मचाया कि आप झूठ बोल रहे हो! तुम्हारे पास क्या सबूत है कि हमने गैस बुक की थी? हम आप लोगों की शिकायत करेंगे! मास्टर जी अनुभवी थे। वो समझ गए कि डराने धमकाने का इऩ पर कोई असर नहीं पड़ेंगा। इसलिए उन्होंने बड़े प्यार से गैस कर्मचारियों को समझाना शुरू किया कि भाई ऐसा मत करो। आप लोगों से गलती हो गयी। कोई बात नहीं। अगर आप हमें हमारा गैस सिलिंडर दे दें तो सब चुपचाप चले जाएंगे! मास्टर जी को लगा कि जैसे बाकी लोगों से वो अपनी बात मनवा लेते थे वैसे ही उनसे भी मनवा लेंगे। वो भूल रहे थे कि दो नंबर की कमाई खाने वाले पूरे दस नंबरी होते है! उनकी चमड़ी इतनी मोटी होती है कि उस पर खौलते पानी के सिवा किसी चीज का असर नहीं होता! जब मास्टर जी कीअनुनय-विनय कोई काम नहीं आई तो उन्होंने एजेंसी कर्मचारियों को धमकाने का प्रयास किया। लेकिन धमकाने से गैस कर्मचारी और भी ज्यादा चिड़ गये और उन्होंने चैलेंज कर दिया कि जिसे जो करना है कर ले! जहां शिकायत करनी है कर दे लेकिन गैस सिलिंडर निर्धारित समय पर ही मिलेगा।
गैस कर्मचारियों की बात सुनकर मास्टर जी और वर्मा जी के साथ-साथ बाकी लोगों के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। हिम्मत दिखाते हुए सभी ने गैस कर्मचारियों को सबक सिखाने के बहुत से उपाय सुझाए! लेकिन किया किसी ने कुछ नहीं। सभी को मालुम था कि इनका कुछ नहीं होने वाला! ये लोग सबसे बनाकर रखते हैं। और ऐसा भी नहीं था बड़े अधिकारियों को इनकी कर्मों के बारे में बिल्कुल न पता हो। इसलिए सभी लोग निराश होकर वापस आ गए। अपने मास्टर जी का हाल सबसे ज्यादा खराब था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि करे तो करे क्या? फिलहाल गैस मिलने का कोई चांस नहीं था। सभी के रुके हुए कामों को करवाने का दम भरने वाले मास्टर जी अपने लिए एक अदद सिलिंडर का जुगाड़ नहीं कर पा रहे थे। मास्टर जी की हालत देखकर वर्मा जी ने उन्हें धैर्य रखने की सलाह दी और साथ में उन्हें चाय पीने के लिए आमंत्रित भी किया। लेकिन मास्टर जी वर्मा जी का धन्यवाद कर भारी कदमों से अपने घर की ओर चल दिए। मास्टर जी को चिंता सता रही थी कि अपनी पत्नी से क्या कहेंगे? अगर पहले ही उनकी बात मान लेते तो आज यह दिन देखना न पड़ता!
घर के दरवाजे पर पहुँचते हुी मास्टर जी ने घंटी बजाई। थोड़ी ही देर में उनकी पत्नी ने दरवाजा खोल दिया। मास्टर जी का उतरा हुआ चेहरा देखकर उनकी पत्नी ने पूछा." कहां थे अब तक? मैं कब से आपकी प्रतीक्षा कर रही थी? फोन भी साथ लेकर नहीं गए! अब जल्दी से हाथ-मुंह धो लो, मैं खाना लगा देती हूं।" खाने का नाम सुनते ही मास्टर जी ने पूछा कि तुम तो कह रही थी कि गैस खत्म हो गयी। फिर खाना कैसा बनाया? 'आपके जाने के घंटे भर बाद ही इंजीनियर साहब गैस सिलिंडर घर पर पहुंचा गए थे। मैं आपको बताना चाहती थीं लेकिन आप फोन घर पर ही छोड़कर पता नहीं कहां-कहां भटक रहे थे।' पत्नी ने उत्तर दिया। पत्नी की बात सुनकर मास्टर जी के शरीर में करेंट दौड़ गया! ऐसा लगा जैसे किसी ने उन्हें ताकत का इंजेक्शन लगा दिया हो! मास्टर जी का चेहरा खिल उठा। मास्टर जी ने कहा, 'लेकिन इंजीनियर के घर पर तो ताला लगा था।'
'कहीं गए हुए थे। लेकिन जैसी उन्हें पता चला कि आप सिलेंडर के लिए उनके घर गए थे तो वो खुद ही सिलेंडर लेकर हमारे घर आ गए।' -पत्नी ने उत्तर दिया।
'चलो ठीक है! गैस मिल गयी इसलिए अब कोई शिकायत नहीं। अंत भला तो सब भला।' - मास्टर जी ने जवाब दिया।
'लेकिन आप अब तक कहां थे?'- उनकी पत्नी ने पूछा।
'मैं...मैं.....मैं कहीं नहीं गया था! पड़ोसी वर्मा जी के साथ था!' - मास्टर जी ने कहा।
मास्टर जी अपने अनुभव को शायद फिर कभी अपनी पत्नी के साथ साझा करें लेकिन उस वक्त वो कुछ भी बताने की मूड में नहीं थे।




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