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अंग्रेज़ी के महान नाटककार विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक "रोमियो और जूलियट" में, पात्र जूलियट एक स्थान पर कहती है कि नाम में क्या रखा है? अर्थात किसी व्यक्ति या वस्तु के नाम से उसकी वास्तविकता या गुण नहीं बदलते। लेकिन मेरी कहानी "अंतिम दाँव" के सभी पात्रों के नाम में बहुत कुछ रखा है। इस कहानी के पात्रों के जैसे नाम हैं वैसे ही उनके काम और स्वभाव हैं।
दूसरी बात यह है कि कभी न कभी आपने भी जरूर सुना होगा कि गाँव का जीवन बहुत बढ़िया है। वहां बहुत शांति है। गाँव ऐसे हैं, गाँव वैसे हैं! वहीं शहर में यह समस्या है, वो समस्या है जैसी तमाम तरह की बातें होती रहती हैं। लेकिन देखने में यह आता है कि गाँव और शहर दोनों की अपनी-अपनी खूबियाँ और कमियाँ हैं। यह बात सत्य है कि शहर में जीवन की गति बहुत तेज है वहीं गाँव में आज भी ठहराव है। शहर में मुश्किल समय में काम आने वालों की संख्या कम होती है वहीं गाँव में दु:ख के समय बहुत से लोग खड़े हो जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गाँव में कोई समस्या ही नहीं। मेरा अनुभव है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस का रिवाज गाँव-देहात में बहुत ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्र में सरकारी जमीन पर सबसे ज्यादा कब्जे ताकतवर लोगों के ही होते हैं। एक-दूसरे की तरक्की से जलने वालों लोगों की संख्या भी गाँव में कम नहीं है। एक-दूसरे से लड़ाने-भिड़ाने वाले लोग भी गाँव में बहुत मिल जाते हैं। चूँकि गाँव में ज्यादातर लोग खेती-किसानी करते हैं इसलिए खेत की मेड़ से जुड़े विवाद ग्रामीण क्षेत्र में बहुत मिलते हैं। होता यह है कि चालाक और दंबग लोग अक्सर मेड़ की घास साफ़ करने के बहाने उसे काटते-छांटते रहते हैं जिससे विवाद और कभी-कभी तो ख़ूनी संघर्ष तक हो जाता है। विवाद की वजह यह होती कि मेड़ की काट-छाँट करने वाले किसान के खेत का आकार बढ़ जाता है वहीं जो काट-छाँट नहीं करता उसका खेत कम होता जाता है। इस कहानी की पृष्ठभूमि में भी एक ऐसा ही विवाद है। कहानी में एक किसान (सज्जन सिंह) के खेत की मेड़ को उसके दबंग पड़ोसी किसान (दुर्जन सिंह) ने बार-बार काट-छाँट कर अपना खेत एक बीघा बढ़ा लिया। स्पष्ट है कि पहले किसान, सज्जन सिंह, का खेत उतना ही कम हो गया। सज्जन सिंह ने इसका विरोध किया लेकिन दुर्जन सिंह नें स्पष्ट मना कर दिया कि उसने उसका एक बीघा खेत हथिया लिया है। अब सवाल उठता है कि सज्जन सिंह क्या करेंगा? क्या वो अपनी जमीन वापस पा लेगा? या फिर वो डर कर बैठ जाएगा? या फिर वो कोई और चाला चलेगा? इन सवालों के जवाब पाने के लिए पढ़िए कहानी "अंतिम दाँव":
उत्तर प्रदेश एक छोटे से गाँव में सज्जन सिंह नाम का एक ईमानदार किसान रहता था। नाम के अनुसार ही सज्जन सिंह का स्वभाव था। उसके पिता और दादा की मेहनत से उसे दस बीघा उपजाऊ खेत विरासत में मिला था। वही खेत उसके परिवार की रोज़ी-रोटी का साधन था। सज्जन सिंह बहुत मेहनती भी था! लेकिन उसका स्वभाव बहुत सीधा और शांत था। वह झगड़े-फसाद से हमेशा दूर रहता था। गाँव के लोग उसकी ईमानदारी और अच्छे स्वभाव की मिसाल देते थे। सज्जन सिंह, अपनी पत्नी, मेधा देवी, और 7 वर्ष की एक बेटी के साथ एक सुख-शांति से रह रहे थे।
उसी गाँव में दुर्जन सिंह नाम का एक चालाक और दबंग किसान भी रहता था। वो धनवान था। कुछ ऐसे लोग भी उसके साथ थे जो उसके इशारे पर काम करते थे। दुर्भाग्य से सज्जन सिंह के खेत के पास ही दुर्जन सिंह का खेत था। दोनों के खेत की मेड़ एक ही थी। अपने सरल स्वभाव के चलते सज्जन सिंह ने कभी भी साझे की मेड़ की कोई कांट-छांट नहीं की! लेकिन दुर्जन सिंह ने मेड़ की कांट-छांट का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे उसने मेड़ को सज्जन सिंह के खेत में खिसकाकर उसकी लगभग एक बीघा जमीन को अपने खेत का हिस्सा बना लिया।
सज्जन सिंह को जब दुर्जन सिंह का खेल समझ आया तो वो बहुत परेशान हो गया। सज्जन सिंह ने सबसे पहले अपना खेत मापा। मापने पर पता चला कि लगभग एक बीघा खेत कम है। सज्जन सिंह ने कुछ ग्रामीणों को साथ लेकर दुर्जन सिंह का खेत भी मापा। दुर्जन सिंह के खेत का क्षेत्रफल उतना ही अधिक निकला। सज्जन सिंह और ग्रामीणों ने यह जानकरी दुर्जन सिंह को दी। साथ ही उससे निवेदन किया वो कि वो साझे की मेड़ को उसके पूर्व स्थान पर ही रहने दे। संदेश स्पष्ट था कि वो सज्जन सिंह की जमीन वापस करे। लेकिन दुर्जन सिंह ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। उसने दावा किया किया कि जब उसने अपना खेत मापा था तो वो पूरा था। सज्जन सिंह ने बड़ी विनम्रता से कहा, "दुर्जन भाई, लगता है आप से खेत मापते समय कोई चूक हो गई है। मैंने ग्रामीणों के साथ आपका खेत मापा है। माप में मेरा जमीन जितनी कम आयी है, उतनी ही जमीन आपके पास ज्यादा निकली है। बात को बढ़ाना ठीक नहीं। कृपया मेरी जमीन मुझे वापस कर दीजिए।"
दुर्जन सिंह हँस पड़ा। "कौन सी तुम्हारी जमीन? जहाँ मेड़ है, वहीं तक मेरी जमीन है। आइंदा जमीन का नाम भी मत लेना। मैं इस मामले में किसी की बात नहीं सुनूंगा। जो करना है कर लो।"दुर्जन सिंह की बात सुनकर सज्जन सिंह को बहुत दुख हुआ। उसने गाँव के बुज़ुर्गों की पंचायत बुलवाई। पंचायत बैठी, दोनों पक्षों की बातें सुनी गईं, लेकिन दुर्जन सिंह ने किसी की एक न सुनी। उसने सज्जन सिंह की जमीन लौटाने से साफ मना कर दिया। दुर्जन सिंह का रवैया देखकर सज्जन सिंह को बहुत निराशा हुई। सज्जन सिंह ने प्रण किया कि वह दुर्जन सिंह की कब्जे से अपनी एक बीघा जमीन निकलवाने की हर संभव कोशिश करेगा।
अगले ही दिन सज्जन सिंह ने सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। पटवारी से लेकर तहसील तक गया। नक्शे निकलवाए, कागज़ दिखा लेकिन हर जगह तारीख पर तारीख मिलती रही। दुर्जन सिंह ने भी मामले को लटकाए रखने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। पानी की तरह पैसा बहाया। अपने उच्च संपर्कों का इस्तेमाल किया। परिणाम यह हुआ कि कई साल बीत गए लेकिन सज्जन सिंह अपनी लगभग एक बीघा जमीन दुर्जन सिंह के कब्जे से नहीं छुड़ा पाया। सज्जन सिंह की हिम्मत जवाब देने लगी। दरअसल इन सब भागदौड़ में सज्जन सिंह का समय, पैसा और मानसिक शांति तीनों ही खत्म होने लगे थे। खेती में भी पहले जैसा मन नहीं लगता था। एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, "मैं अब थक गया हूँ। अपनी ही जमीन के लिए भीख माँगते-माँगते जिंदगी निकल रही है।"
पत्नी, मेधा, ने भी भारी मन से कहा, "कभी-कभी मन की शांति, जमीन से भी ज्यादा कीमती होती है। जितनी जमीन हमारे पास है, वही बहुत है। पहले ही बहुत पैसा लग चुका है। हासिल कुछ हुआ नहीं! इस तरह की भाग दौड़ केवल वही लोग कर सकते हैं जिनके पास बहुत पैसा है, समय है और जिनकी पहुंच ऊपर तक है। आप चाहो तो इस लड़ाई को बस यहीं खत्म कर दो। आप जो भी निर्णय करोगे, मैं आपका साथ दूंगी।" अपनी पत्नी की बात सुनकर सज्जन सिंह कुछ सोचने लगा। वह जानता था कि उसकी पत्नी सही कह रही थी। बस वो यह नहीं समझ पा रहा था कि करें तो कर क्या? दुर्जन सिंह के सामने सज्जन सिंह की एक भी नहीं चल रही थी। ऐसे में उसके पास दूसरा क्या उपाय हो सकता था? क्या कोई और दाँव था जो वो चल सकता था और और दुर्जन सिंह को सबक सिखा सकता था?
बहुत सोच-विचार के बाद सज्जन सिंह ने एक कठिन निर्णय लिया!सज्जन सिंह के गांव के पास एक अन्य गांव भी था। उस गांव में शेर सिंह नाम का एक बड़ा किसान रहता था। शेर सिंह न केवल पैसे वाला था बल्कि वो दबंग भी था। उसके दो जवान बेटे थे।उसकी एक खास बात यह थी वो न्यायप्रिय स्वभाव के लिए जाना जाता था। उसके पास सैकड़ों बीघा जमीन थी, आधुनिक खेती के साधन थे और गाँव-समाज में उसकी अच्छी प्रतिष्ठा थी। लोग कहते थे कि वह किसी का हक़ नहीं मारता था। स्पष्ट था कि ऐसा व्यक्ति अपने अधिकार पर कोई कब्ज़ा भी नहीं होने देता होगा। वो सज्जन सिंह को भी जानता था।
सज्जन सिंह ने काफी सोच-विचार के बाद एक फैसला किया। वो शेर सिंह से मिलने पहुँचा। शेर सिंह ने सज्जन सिंह को बड़े सम्मान से बैठाया और पूछा, "कहो सज्जन भाई, कैसे आना हुआ। सब कुशल से तो हैं?" सज्जन सिंह ने पूरी कहानी विस्तार से सुना दी। फिर बोला, "मैं अपना पूरा दस बीघा खेत आपको बेचना चाहता हूँ। लेकिन मेरी एक शर्त है। उस एक बीघा जमीन को भी वापस लीजिएगा, जिस पर दुर्जन सिंह ने कब्ज़ा कर रखा है।"
शेर सिंह कुछ देर शांत बैठा रहा। फिर मुस्कराकर बोला, "तुम्हारा खेत मैं खरीद लूँगा। और जहाँ तक कब्ज़े की बात है, अब वह जमीन भी मेरी होगी। अपना हक़ लेना मुझे आता है। कीमत भी पूरे 10 बीघे की दूँगा।"
दोनों के बीच उचित कीमत पर सौदा तय हो गया। रजिस्ट्री पूरी हुई। सज्जन सिंह ने पूरे दस बीघा खेत की कीमत प्राप्त कर ली। सज्जन सिंह ने उन रुपयों को FD (Fixed Diposit) में जमा कर दिया। उसकी योजना थी कि वो FD पर मिलने वाले ब्याज से अपनी गुजर - बसर करेगा। उसने एक दुकान भी खोल ली। सज्जन सिंह के निर्णय पर उसकी पत्नी ने कुछ भी नहीं कहा। वह एक समझदार महिला थी। उसे अपने पति पर पूरा भरोसा था।
गाँव में यह खबर आग की तरह फैल गई। दुर्जन सिंह को भी पता चल गया। लेकिन वह डरा नहीं। वह एक घाघ और घमंडी व्यक्ति था। आसानी से हार मान लेना उसके स्वभाव में ही नहीं था। दुर्जन सिंह ने मूछों पर ताव देकर कहा, "जो जमीन इतने सालों से मैंने सज्जन सिंह को नहीं लौटाई, उसे शेर सिंह को भी नहीं दूँगा।" यहां दुर्जन सिंह वही गलती कर रहा था जो उसके जैसे व्यक्ति करते हैं। वो शेर सिंह को कमतर आंक रहा था।
उधर शेर सिंह, दुर्जन सिंह का भी उस्ताद निकला। जमीन नाम कराने के तत्काल बाद वो पटवारी और संबंधित उच्च अधिकारियों से मिला। उसी दिन वो इलाके के विधायक, बलदेव सिंह, से भी मिलकर आया। इलेक्शन के दौरान शेर सिंह, बलदेव सिंह की मदद करता था। बलदेव सिंह ने शेर सिंह को आश्वासन दिया था कि कि वह उसकी हर संभव मदद करेगा।
पूरी तैयारी के बाद शेर सिंह, सारे कागज़ात, जमीन की माप करने वाली सरकारी टीम ,पुलिस के सिपाहियों और कुछ मजदूरों के साथ खेत पर जा पहुँचा। पहले उसने अधिकारियों से जमीन की माप करवाई। सरकारी रिकॉर्ड में साबित हो गया कि दुर्जन सिंह की लगभग एक बीघा जमीन वास्तव में उसी खेत का हिस्सा थी, जिसे अब शेर सिंह खरीद चुका था। दुर्जन सिंह आसानी से जमीन देने को तैयार नहीं हुआ। उसने इशारों-इशारों में सरकारी टीम के सदस्यों को घूस देने की पेशकश की। लेकिन एक भी सदस्य उसकी बातों में नहीं आया। उल्टे उन्होंने दुर्जन सिंह को धमकाया कि वो सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत का लालच न दे, वरना उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। दुर्जन सिंह सकपका गया और एक तरफ जाकर खड़ा हो गया।
माप पूरी होने के बाद शेर सिंह सीधे दुर्जन सिंह के पास पहुँचा।उसने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, "दुर्जन सिंह, अब यह जमीन मेरी है। सरकारी रिकॉर्ड भी यही कहता है। मैं किसी का हक़ नहीं छीनता, लेकिन अपना हक़ किसी को रखने भी नहीं देता। इसलिए आज ही मेड़ को सही जगह पर करने दो।"
दुर्जन सिंह ने बहस करने की कोशिश की, लेकिन इस बार सामने सज्जन सिंह नहीं था। सामने शेर सिंह था, जिसकी बात काटने का दम वहां किसी में नहीं था। उसके पास कानूनी कागज़ भी थे और अपनी बात पर अडिग रहने का साहस भी। वहाँ मौजूद पुलिस वाले भी शेर सिंह का पक्ष लेते दिखे। दुर्जन सिंह को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
आख़िरकार दुर्जन सिंह को हार माननी पड़ी। पहली बार उसकी सारी अकड़ निकल गई। हवा का रुख बदल चुका था। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि सज्जन सिंह का 'अंतिम दाँव' उस पर इतना भारी पड़ेगा। वो उसी तरह लाचार लग रहा था जैसे सज्जन सिंह उसके सामने हुआ करता था। न चाहते हुए भी उसे मेड़ को सही स्थान पर लगवाने के लिए राजी होना पड़ा। शेर सिंह के इशारे पर मजदूरों ने मेड़ फिर से सही स्थान पर बना दी.और वर्षों बाद वह एक बीघा खेत अपने वास्तविक मालिक की जमीन में वापस जुड़ गया था। गाँव वाले यह दृश्य देखकर दंग रह गए।
उधर सज्जन सिंह पूरी तरह निश्चिंत हो चुका था। FD के बाद बचे बाकी पैसों से उसने जो दुकान खोली थी, उसके अच्छे स्वभाव के चलते दुकान बढ़िया चलने लगी। अब उसे न मौसम की चिंता थी, न फसल खराब होने का डर, न किसी कब्ज़े का तनाव।
उधर शेर सिंह ने पूरे दस बीघा खेत को आधुनिक तरीके से विकसित किया। सिंचाई की नई व्यवस्था बनाई, बेहतर बीज लगाए और वहाँ भरपूर फसल होने लगी। गाँव के दूसरे किसान भी उससे नई तकनीक सीखने आने लगे।
दुर्जन सिंह जब भी उस खेत के पास से गुजरता, तो सारी कहानी उसकी आंखों के सामने तैर जाती। उसे याद आ जाता कि उसने लालच में पड़कर वर्षों तक किसी और की जमीन दबाए रखी थी, लेकिन अंत में उसे सब लौटानी पड़ी। साथ में अपमान का कड़वा घूंट पीना पड़ा था। बहुत दिनों तक उसने घर से निकलना और लोगों से मिलना भी कम कर दिया था। पूरे प्रकरण से उसे सिर्फ़ अपमान और पछतावा ही मिला।
- वीरेंद्र सिंह




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