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| CJP Andolan at Jantar-Mantar |
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरन कथित तौर पर एक जज ने मौखिक टिप्पणी में बेरोजगार युवाओं की तुलना 'तिलचट्टों' से और 'समाज के परजीवियों' से की थी। हालांकि बाद में उन्हीं जज ने अपनी सफाई में कहा था कि यै बेबुनियाद है कि मैंने अपने देश के युवाओं की आलोचना की और हर युवा मुझे प्रेरित करता है। जज साहब को शायद ही इस बात का अहसास होगा कि सही उद्धेश्य से कही गयी उनकी बात से एक पार्टी का जन्म हो जाएगा और आगे चलकर वो एक आँदोलन खड़ा कर देगी जिसके चलते देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ेगा । मैं बात कर रहा हूं कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की जो आजकल सुर्खियों में हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दीपके हैं। जज महोदय के बयान के बाद इन्हीं अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों से राय लेकर 16 मई 2026 को 'CJP' यानि ऑनलाइन "कॉकरोच जनता पार्टी" बना ली। दरअसल अभिजीत दीपके ने जज साहब की बातों का युवाओं का अपमान समझा था। मजाक में शुरू हुई पार्टी के कुछ ही घंटों में तमाम लोग सदस्य बन गए थे। उन्होंने अपने आप को रजिस्टर्ड भी कराया। पूर्व क्रिकेटर और सांसद कीर्ती आजाद और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के अलावा बहुत से लोगों ने इसका समर्थन किया था।
इसी कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट परीक्षा (NEET-UG-2026) में हुई पेपर लीक की घटना और इससे पहले भी कई परीक्षाओं में हुए पेपर लीक के मामलों के मद्देनज़र केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मुख्य मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया था। अन्य मांगों में NEET Paper leak मामले की निष्पक्ष जांच, पेपर लीक के बाद उत्पन्न परीक्षा संकट के चलते जिन छात्रों ने आत्महत्या की थी उनके परिजन को एक-एक करोड़ के मुआवजे की मांग भी की गयी थी। आंदोलन के मुख्य चेहरों में CJP संस्थापक अभिजीत दीपके और पर्यावरण कार्यकर्ता (सोनम वांगचुक जिन्होंने 26 अनशन किया) शामिल थे। CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका और वरुण दास भी सक्रिय रूप से आंदोलन की बात लोगों के सामने रख रहे थे। आंदोलन की मांगों को देखते हुए इस आंदोलन को सफल होना चाहिेए! हालांकि आंदोलनकारियों के तौर तरीकों पर सवाल भी उठे थे!
एक लोकतांत्रिक समाज सभी को अपनी मांगें रखने का अधिकार है। इस पार्टी के समर्थकों को अधिकार है कि वो आंदोलन करें और शांति के साथ अपनी बात जनता और सरकार तक पहुँचाएं। इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में कुछ भी बुराई या ग़लत नहीं था। आंदोलन के उद्देश्य भी कुछ हद तक सही थे। जहां तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की बात है तो उस पर जिद छोड़ी जा सकती थी क्योंकि नीट परीक्षा National Testing Agency अर्थात NTA कराती है। तो अगर इस्तीफे की ही बात थी तो सबसे पहले NTA अध्यक्ष डॉ प्रदीप कुमार जोशी का इस्तीफा मांगा जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़े रहे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
CJP संयोजक ने दावा किया था कि वो किसी राजनीतिक दल के नेताओं या उनके समर्थकों को अपने आंदोलन के मंच पर जगह नहीं देंगे। लेकिन आंदोलन में वामपंथी विचार धारा से जुड़े संगठन उसमें शामिल दिखे। जल्दी भारत के विपक्षी दलों ने भी इस आंदोलन की आड़ में राजनीतिक चालें चलनी शुरू कर दीं थी। कुछ नेताओं को इनके मंच पर जगह मिलने लगी। लोगों को लगने लगा कि आंदोलन पूरी तरह छात्र-केंद्रित न रहकर राजनीतिक रंग लेने लगा। इससे कुछ वर्गों में इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे थे। अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के अतीत में दिए गए बयानों पर भी विवाद हुआ था।
अन्ना आंदोलन में जो भूमिका केजरीवाल की थी वही भूमिका इस आंदोलन में अभिजीत दीपके निभा रहे थे। लेकिन दोनों के व्यक्तित्व में बहुत अंतर है। केजरीवाल स्पष्ट तरीके सेअपनी बात जनता तक पहुँचाते थे। केजरीवाल जबरदस्त संवादकर्ता थे। वो लोगों को अपनी बात से प्रभावित कर लेते थे। साथ में एक से एक प्रभावशाली वक्ता थे जिनमें सबसे ज्यादा प्रमुख थे कवि कुमार विश्वास। कुमार विश्वास की मास अपील Mass Appeal केजरीवाल से भी ज्यादा थी। अभिजीत दीपके और उनकी पार्टी प्रवक्ताओं में ऐसी कोई बात नहीं थी ज्यादातर लोग तो अभिजीत दीपके को शायद पहचान भी ना पा थे। अन्ना के मुकाबले सोनम वांगचुक भी कहीं नहीं ठहरे।
यह भी एक विडंबना ही है कि जिस आंदोलन का मुख्य उदेश्य शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और छात्र हित था उसमें जगह-जगह पर अलग-्अलग समूहों ने अलग-अलग नारें और मांगें उठाईं। 'नाम रहेगा अल्लाह का' , 'मेरा जेंडर मेरी मर्जी', सवर्ण समाज विरोधी नारे और साधु-संतों व सनातन विरोधी नारे लगे। भला इस आंदोलन में ऐसे नारों का क्या काम?
कोढ़ में खाज़ का काम उन लड़के-लड़कियों ने कर दिया जिन्होंने खुले आम अश्लील नारे लगाए। देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी की मां को गाली दी। खुद पीएम को गोली मारने की बात कही गयी। अपने दादा की उम्र के उस पीएम, जिसका सममान देश-विदेश में है, के बारें में ऐसे नारे लगाए गए जिनमें किसी का भी मैं उल्लेख नहीं करूंगा क्योंकि वे नारे बेहद आपत्तिजनक हैं। इनके नारे और इरादे जानकर लगा कि कहीं धरती न फट जाए! ZEN Z के अश्लील और घोर आपत्तिजनक नारों के बाद लोग ZEN Z की समझ पर ही सवाल उठे। लोगों का मानना है कि इस पीढ़ी के लोगों को ना अपनी संस्कृति की समझ है और न ही बड़ों के सम्मान की चिंता। जिस ZEN Z को लोग इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं उसकी समझ देखकर लोग माथा पीट रहे थे। सच पूछिए तो PM MODI को लेकर लगे घोर आपत्तिजनक नारे इस आंदोलन पर बड़ा कलंक है। आंदोलन की नैतिक और सामाजिक स्वीकार्यता बुरी तरह प्रभावित हुई है। इतना होने के बाद भी अगर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया है तो इसे पीएम मोदी का बड़प्पन ही समझना चाहिए।
जब किसी भी अच्छे आंदोलन का उद्देश्य सही हो तो उसके तौर-तरीकों को भी सही या कम से कम स्वीकार्य तो होना ही चाहिए। CJP के आंदोलन से ये दोनो ही बातें गायब थी! इनका उदेश्य राजनीतिक हो गया था।
किसी भी आंदोलन की प्रभावशीलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अपने मूल उद्देश्य पर कितना केंद्रित रहता है, अपनी मांगों को कितना स्पष्ट रखता है, और विरोध के दौरान भाषा एवं व्यवहार कितना संयमित रखता है। हम इस आंदोलन का मूल्यांकन करें तो पातें है कि आंदोलन बहुत जल्द ही मुख्य मुद्दे से भटका लगा था। भले ही इनकी मांगे मान ली गई हों! शुरुआत पेपर लीक के विरोध से हुए लेकिन बाद में इसमें तमाम गैर जरूरी मुद्दे शामिल हो गए। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हुए। इससे मुख्य मुद्दे से ध्यान भटक गया। व्यक्तिगत हमले शुरू हो गये। गाली-गलौज और अभ्रद व घोर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग होने लगा। आंदोलन की नैतिक शक्ति खत्म होने लगी थी। आंदोलन की छवि राजनैतिक बन गयी। अनुशासन की भी कमी थी।
हालांकि यह भी सत्य है किसी भी बड़े जनआंदोलन में किसी एक पक्ष को पूरी तरह दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। यदि सरकार शुरुआती दौर में अधिक प्रभावी संवाद, तेज़ निर्णय और पारदर्शी संवाद प्रक्रिया को अपनाती और इस्तीफा ले लेती तो संभव है कि तनाव कुछ कम होता। दूसरी ओर, आंदोलनकारियों के लिए भी शांतिपूर्ण और अनुशासित विरोध बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
आंदोलनकारी छात्रों के लिए अच्छी बात यह रही कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है। होना तो यह चाहिए था कि छात्रों की सभी मांगे तत्काल मान ली जाती। वहीं इस्तीफे तुरंत बाद अभिजीत दीपके का बयान में विनम्रता का अभाव दिखा। उन्होंने अपने भाषण में मोदी की तानाशाही के खिलाफ नारे लगवाए। अब ये सोचने वाली बात है कि अगर मोदी तानाशाह होते तो क्या मंत्री का इस्तीफा दिला देते। दीपके के रवैये में अहंकार था। जबकि ऐसे मौके पर व्यक्ति को गरिमा पूर्ण व्यवहार करना चाहिए था। दीपके और उनके साथियों को समझना चाहिए कि प्रधान के इस्तीफे से मोदी की छवि मजबूत हुई है। यह राजनीति है। यहां perception का खेल है! मेरी राय में इस मामले में मोदी ने बाजी मार ली है!अब आगे क्या होता है यह देखना दिलचस्प रहेगा!




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